पटना 25.04.2017

वर्तमान पर्यावरण व वन मंत्री तेज प्रताप यादव के 700 करोड़ की लागत से सात लाख स्क्वायर फीट में निर्माणाधीन मॉल की मिट्टी चिड़ियाघर में खपाई गई जिसका जवाब मंत्री को खुद देना चाहिए था मगर 10 साल पहले रिटायर्ड हो चुके पूर्व मंत्री से बयान दिलाया जा रहा है। मॉल से जू में लाई गई मिट्टी में केमिकल मिलाया जा रहा है ताकि जांच को भ्रमित किया जा सकें। आखिर सरकार सर्वदलीय समिति व मिट्टी की जांच से क्यों भाग रही है?

एक लाख 70 हजार वर्गफिट में निर्माणाधीन मॉल की दो एकड़ जमीन की 25 फिट गहरी मिट्टी की कटाई से गोलघर जैसी आकृति बन सकती है। आखिर जू में नही तो वह मिट्टी कहां खपाई गयी? सरकार यह क्यों नहीं बता रही है किस नियम और प्रक्रिया के तहत मंत्री की मिट्टी की खरीद उसके ही विभाग में की गई?

60 साल पहले (1955) के सर्कुलर का हवाला दे कर आज के काले कारनामे को सफेद करने की असफल कोशिश की जा रही है कि विभाग में टेंडर के जरिए काम कराने की परम्परा नहीं है तो फिर अरण्य भवन व गया में फॉरेस्ट ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट का निर्माण टेंडर के जरिए क्यों कराया जा रहा है? तब पर्यावरण व वन राजस्व विभाग के अंदर था। सरकार बतायें कि कहां लिखा है कि बिना टेंडर के काम कराया जायेगा?

पहले सरकार ने कहा कि जू में पाथवे का निर्माण कराया जा रहा है अब पलटी मार कर कह रही है कि काटे गए पेड़ों की खाली जगह भरने के लिए मिट्टी का इस्तेमाल किया गया। तो जू में बनाए गए 4 फिट ऊंचे तटबंध जैसे पाथवे जिसकी विडियो व फोटोग्राफ सार्वजनिक है के लिए किस फंड व योजना के तहत कहां से मिट्टी लाई गई? क्या यह योजना नेशनल जू ऑथिरिटी द्वारा मास्टर मैनेजमेंट प्लान से स्वीकृत थी?